Lord Vishnu

श्री मध्वाचार्य कृत द्वादश स्तोत्र - नवमस्तोत्रम्

(Dvadasha Stotra - Ninth Stotra)

Madhvacharya

This hymn is the ninth segment of the Dvadasha Stotra, a magnificent collection of twelve poems composed by the Dvaita philosopher Sri Madhvacharya. In this moving prayer, he praises Lord Vishnu as Rama, the eternal consort of Lakshmi and the singular cause of the universe. The composition serves as a profound meditation on the divine qualities and the supreme status of the Lord. Chanting this stotra is believed to bestow spiritual wisdom, liberation from the cycle of rebirth, and the grace of Lord Vishnu, leading the devotee toward ultimate beatitude and inner peace.

अथ नवमस्तोत्रम्

अतिमततमोगिरिसमितिविभेदन पितामहभूतिद गुणगणनिलय ।
शुभतम कथाशय परमसदोदित जगदेककारण रामरमारमण ॥ 1॥
विधिभवमुखसुरसततसुवन्दितरमामनोवल्लभ भव मम शरणम् ।
शुभतम कथाशय परमसदोदित जगदेककारण रामरमारमण ॥ 2॥
अगणितगुणगणमयशरीर हे विगतगुणेतर भव मम शरणम् ।
शुभतम कथाशय परमसदोदित जगदेककारण रामरमारमण ॥ 3॥
अपरिमितसुखनिधिविमलसुदेह हे विगत सुखेतर भव मम शरणम् ।
शुभतम कथाशय परमसदोदित जगदेककारण रामरमारमण ॥ 4॥
प्रचलितलयजलविहरण शाश्वतसुखमयमीन हे भव मम शरणम् ।
शुभतम कथाशय परमसदोदित जगदेककारण रामरमारमण ॥ 5॥
सुरदितिजसुबलविलुलितमन्दरधर पर कूर्म हे भव मम शरणम् ।
शुभतम कथाशय परमसदोदित जगदेककारण रामरमारमण ॥ 6॥
सगिरिवरधरातलवह सुसूकरपरमविबोध हे भव मम शरणम् ।
शुभतम कथाशय परमसदोदित जगदेककारण रामरमारमण ॥ 7॥
अतिबलदितिसुत हृदय विभेदन जयनृहरेऽमल भव मम शरणम् ।
शुभतम कथाशय परमसदोदित जगदेककारण रामरमारमण ॥ 8॥
बलिमुखदितिसुतविजयविनाशन जगदवनाजित भव मम शरणम् ।
शुभतम कथाशय परमसदोदित जगदेककारण रामरमारमण ॥ 9॥
अविजितकुनृपतिसमितिविखण्डन रमावर वीरप भव मम शरणम् ।
शुभतम कथाशय परमसदोदित जगदेककारण रामरमारमण ॥ 10॥
खरतरनिशिचरदहन परामृत रघुवर मानद भव मम शरणम् ।
शुभतम कथाशय परमसदोदित जगदेककारण रामरमारमण ॥ 11॥
सुललिततनुवर वरद महाबल यदुवर पार्थप भव मम शरणम् ।
शुभतम कथाशय परमसदोदित जगदेककारण रामरमारमण ॥ 12॥
दितिसुतविमोहन विमलविबोधन परगुणबुद्ध हे भव मम शरणम् ।
शुभतम कथाशय परमसदोदित जगदेककारण रामरमारमण ॥ 13॥
कलिमलहुतवह सुभग महोत्सव शरणद कल्कीश भव मम शरणम् ।
शुभतम कथाशय परमसदोदित जगदेककारण रामरमारमण ॥ 14॥
अखिलजनिविलय परसुखकारण परपुरुषोत्तम भव मम शरणम् ।
शुभतम कथाशय परमसदोदित जगदेककारण रामरमारमण ॥ 15॥
इति तव नुतिवरसततरतेर्भव सुशरणमुरुसुखतीर्थमुनेः भगवन् ।
शुभतम कथाशय परमसदोदित जगदेककारण रामरमारमण ॥ 16॥
इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्य विरचितं द्वादशस्तोत्रेषु नवमस्तोत्रं सम्पूर्णम्

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