Lord Shiva

नटराज स्तोत्रं (पतञ्जलि कृतम्)

(Nataraja Stotram (Patanjali Kritam))

Patanjali

Attributed to the sage Patanjali, who is considered an incarnation of Adishesha, this exquisite hymn celebrates the cosmic dance of Lord Shiva at Chidambaram. The verses describe Shiva as the master of the inner consciousness, the destroyer of worldly illusions, and the source of all liberation. By chanting this stotra, the devotee seeks to align their mind with the eternal dance of the universe, aiming for spiritual purification and mental stillness. It is believed that regular recitation grants deep devotion, removes the fear of death, and reveals the brilliance of the divine consciousness within the heart.

अथ चरणशृङ्गरहित श्री नटराज स्तोत्रं सदञ्चित-मुदञ्चित निकुञ्चित पदं झलझलं-चलित मञ्जु कटकम् ।

पतञ्जलि दृगञ्जन-मनञ्जन-मचञ्चलपदं जनन भञ्जन करम् ।
कदम्बरुचिमम्बरवसं परममम्बुद कदम्ब कविडम्बक गलम्
चिदम्बुधि मणिं बुध हृदम्बुज रविं पर चिदम्बर नटं हृदि भज ॥ 1 ॥
हरं त्रिपुर भञ्जन-मनन्तकृतकङ्कण-मखण्डदय-मन्तरहितं
विरिञ्चिसुरसंहतिपुरन्धर विचिन्तितपदं तरुणचन्द्रमकुटम् ।
परं पद विखण्डितयमं भसित मण्डिततनुं मदनवञ्चन परं
चिरन्तनममुं प्रणवसञ्चितनिधिं पर चिदम्बर नटं हृदि भज ॥ 2 ॥
अवन्तमखिलं जगदभङ्ग गुणतुङ्गममतं धृतविधुं सुरसरित्-
तरङ्ग निकुरुम्ब धृति लम्पट जटं शमनदम्भसुहरं भवहरम् ।
शिवं दशदिगन्तर विजृम्भितकरं करलसन्मृगशिशुं पशुपतिं
हरं शशिधनञ्जयपतङ्गनयनं पर चिदम्बर नटं हृदि भज ॥ 3 ॥
अनन्तनवरत्नविलसत्कटककिङ्किणिझलं झलझलं झलरवं
मुकुन्दविधि हस्तगतमद्दल लयध्वनिधिमिद्धिमित नर्तन पदम् ।
शकुन्तरथ बर्हिरथ नन्दिमुख भृङ्गिरिटिसङ्घनिकटं भयहरम्
सनन्द सनक प्रमुख वन्दित पदं पर चिदम्बर नटं हृदि भज ॥ 4 ॥
अनन्तमहसं त्रिदशवन्द्य चरणं मुनि हृदन्तर वसन्तममलम्
कबन्ध वियदिन्द्ववनि गन्धवह वह्निमख बन्धुरविमञ्जु वपुषम् ।
अनन्तविभवं त्रिजगदन्तर मणिं त्रिनयनं त्रिपुर खण्डन परम्
सनन्द मुनि वन्दित पदं सकरुणं पर चिदम्बर नटं हृदि भज ॥ 5 ॥
अचिन्त्यमलिवृन्द रुचि बन्धुरगलं कुरित कुन्द निकुरुम्ब धवलम्
मुकुन्द सुर वृन्द बल हन्तृ कृत वन्दन लसन्तमहिकुण्डल धरम् ।
अकम्पमनुकम्पित रतिं सुजन मङ्गलनिधिं गजहरं पशुपतिम्
धनञ्जय नुतं प्रणत रञ्जनपरं पर चिदम्बर नटं हृदि भज ॥ 6 ॥
परं सुरवरं पुरहरं पशुपतिं जनित दन्तिमुख षण्मुखममुं
मृडं कनक पिङ्गल जटं सनक पङ्कज रविं सुमनसं हिमरुचिम् ।
असङ्घमनसं जलधि जन्मगरलं कवलयन्त मतुलं गुणनिधिम्
सनन्द वरदं शमितमिन्दु वदनं पर चिदम्बर नटं हृदि भज ॥ 7 ॥
अजं क्षितिरथं भुजगपुङ्गवगुणं कनक शृङ्गि धनुषं करलसत्
कुरङ्ग पृथु टङ्क परशुं रुचिर कुङ्कुम रुचिं डमरुकं च दधतम् ।
मुकुन्द विशिखं नमदवन्ध्य फलदं निगम वृन्द तुरगं निरुपमं
स चण्डिकममुं झटिति संहृतपुरं पर चिदम्बर नटं हृदि भज ॥ 8 ॥
अनङ्गपरिपन्थिनमजं क्षिति धुरन्धरमलं करुणयन्तमखिलं
ज्वलन्तमनलं दधतमन्तकरिपुं सततमिन्द्र सुरवन्दितपदम् ।
उदञ्चदरविन्दकुल बन्धुशत बिम्बरुचि संहति सुगन्धि वपुषं
पतञ्जलि नुतं प्रणव पञ्जर शुकं पर चिदम्बर नटं हृदि भज ॥ 9 ॥
इति स्तवममुं भुजगपुङ्गव कृतं प्रतिदिनं पठति यः कृतमुखः
सदः प्रभुपद द्वितयदर्शनपदं सुललितं चरण शृङ्ग रहितम् ।
सरः प्रभव सम्भव हरित्पति हरिप्रमुख दिव्यनुत शङ्करपदं
स गच्छति परं न तु जनुर्जलनिधिं परमदुःखजनकं दुरितदम् ॥ 10 ॥
इति श्री पतञ्जलिमुनि प्रणीतं चरणशृङ्गरहित नटराज स्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

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